ख़ुशी क्या है ? ख़ुशी वह है जो युधिष्टिर को धर्म के पालन में मिली होगी ! विक्रमादित्य को न्याय देने में मिली होगी ! वही जो हरिश्चंद्र को सत्य बोलने में मिली होगी ! वही जो एक बच्चे को रेत या कीचड़ में खेलने से मिलती होगी ! वही जो कालिदास को अपनी नाट्य रचनाओं को लिखने पर मिली होगी ! जो खरीदी जा सके वह ख़ुशी नहीं है ! जो नापी जा सके वह ख़ुशी नहीं है ! जो बाहर से प्राप्त की जा सके वह भी ख़ुशी नहीं है ! ये सब तो एक प्लेजर मात्र हैं ! ख़ुशी नहीं ! ख़ुशी भीतर से आती है ! आत्मा खुश होती है !ह्रदय प्रसन्न होता है ! जब मन मयूरा नाचने लगता है ! तो मन बाग-बाग हो उठता है -हम खुश होते हैं ! ख़ुशी ,जीवन की जननी है , जीवन की प्रेरणा है ! व्यक्ति को खुश रहने के लिए कभी दुखी नहीं होना चाहिए ! एक सच्ची कथा है ! महाकवि माघ को जो कुछ भी भेंट में मिलता वह सब किसी न किसी जरुरतमन्द को दान कर देते ! उनकी पत्नी इस आदत से बड़ी दुखी और विचलित थी ! वह कई बार उन्हें छोडकर मायके जाने की धमकियां देती ! एक बार एक निर्धन ब्राह्मण उनके घर आया ! ब्राह्मण ने उन्हें आने का अपना प्रयोजन बताया -कि उसकी बेटी का विवाह है ! किन्तु विवाह के लिए उसके पास पैसे नहीं है ! मैने सुना है की महाकवि माघ बड़े दानवीर हैं , इसीलिए मैं आपके पास आया हूँ ! ब्राह्मण की बात सुनकर माघ धक्क रह गये ! अब मैं इस ब्राह्मण के लिए पैसे कहाँ से लाऊँ ? माघ ने पहले अपने घर का सामान चुराया और फिर रात को चुपके से अपनी पत्नी के हाथ से सोने का कंगन निकाल लिया और उस ब्राह्मण को देकर भिजवा दिया ! सुबह जब पत्नी ने अपना कंगन नहीं देखा तो गुस्से से क्रुद्ध हो गयी ! माघ इधर उधर ध्यान बंटाने का झुन्ठा नाटक करते रहे ! तभी अचानक पत्नी मुस्कान लिए अपने दूसरे हाथ का कंगन माघ को देती हुई बोली - इतने विद्वान हो , फिर भी यह नहीं जानते कि बेटी को एक नहीं , दो कंगन दिए जाते हैं ! उपनिषद में है यह गाथा ! सन्दर्भ तो ग्रहस्थ जीवन है , पर सुसंस्कारी पत्नी यह समझती है कि ख़ुशी तो त्याग में है ! कैसे किसी और को प्रसन्न देखकर हम प्रसन्न होते हैं ! दूसरे को देकर ही असली ख़ुशी मिलती है!
No comments:
Post a Comment